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धूमधाम से मनी मंगसीर बग्वाल, तेवा में ‘सॉन्ग घोड़ी’ व बेडार्त कार्यक्रम रहे आकर्षण

थत्यूड़/जौनपुर। जौनपुर विकासखंड क्षेत्र में पारंपरिक आस्था और उत्सव के बीच तीन दिवसीय मंगसीर बग्वाल बड़े हर्षोल्लास से मनाई गई। 18 नवंबर से शुरू हुए इस पारंपरिक पर्व का समापन गुरुवार को ब्रताताणी (रस्साकस्सी) के आयोजन के साथ हुआ।

वीरभद्र माधौ सिंह भंडारी की तिब्बत विजय से जुड़ी है परंपरा

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह दीपावली दो मुख्य कारणों से मनाई जाती है।
पूर्व जेष्ठ उप प्रमुख महिपाल सिंह रावत, पूर्व प्रधान विजेंद्र सजवाण, जगमोहन सिंह रावत, मालचंद पंवार, रत्नमणी गौड़ और प्रेम सिंह राणा बताते हैं कि—

  1. प्राचीन काल में वीरभद्र माधौ सिंह भंडारी तिब्बत विजय के दौरान एक माह देर से लौटे थे। उनके आगमन पर तत्कालीन गढ़वाल राजा के निर्देश से इस दीपावली का आरंभ हुआ।
  2. राष्ट्रीय दीपावली के समय पहाड़ों में कृषि कार्य चरम पर रहते हैं, जिसके चलते लोग पर्व पूरी तरह नहीं मना पाते। ऐसे में फसल कटाई के बाद सामूहिक हर्षोल्लास से यह विशेष दीपावली मनाने की परंपरा पड़ी।

तीन दिनों तक चलता है पारंपरिक उत्सव

पहला दिन — परंपरागत अस्के बनाए जाते हैं और शाम को ढोल-नगाड़ों के साथ बग्वाल खेली जाती है।

दूसरा दिन — संवाले पकोड़े बनाए जाते हैं और पुनः शाम को बग्वाल का आयोजन होता है।

तीसरा दिन (बदराज) — इस दिन दिन में बग्वाल खेली जाती है। दोपहर बाद ‘व्रत’ तैयार किया जाता है, जिसे भवाई घास से बनाकर पंचायती चौक में शेषनाग देवता के रूप में स्थापित किया जाता है। इसके बाद प्रत्येक परिवार धूप, अक्षत और चूड़े से पूजा करता है। कार्यक्रम का समापन पूरे गांव द्वारा मैदान में सामूहिक रस्साकस्सी के साथ होता है।

तेवा ग्राम पंचायत में आकर्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम

ग्राम पंचायत तेवा में इस वर्ष पिछले वर्षों की अपेक्षा अधिक भव्य आयोजन देखने को मिला। ग्रामीणों व युवाओं की सहभागिता से आयोजित कार्यक्रम में बाहर से आए मेहमानों ने भी रासों-तांदी नृत्य प्रस्तुत कर माहौल को उत्सवमय बना दिया।

इस बार ‘सॉन्ग घोड़ी’ कार्यक्रम और रात्रि बेडार्त मुख्य आकर्षण रहे। ग्रामीणों ने इन पारंपरिक प्रस्तुतियों को दिव्य और भव्य रूप में मनाते हुए पर्व को यादगार बना दिया।

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