थत्यूड़ में पौराणिक रामलीला का आगाज, श्रवण कुमार के मार्मिक प्रसंग ने भावुक किए दर्शक
रावण तपस्या और कैलाश लीला के मंचन से गूंजा रामलीला मंच, कलाकारों ने जीवंत किए पौराणिक प्रसंग; धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का दिया संदेश

रिपोर्ट: सुनील सजवाण
थत्यूड़ (टिहरी गढ़वाल)। जौनपुर विकासखंड मुख्यालय थत्यूड़ में धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक समिति के तत्वावधान में आयोजित पौराणिक रामलीला का शुभारंभ श्रवण कुमार लीला, रावण तपस्या और कैलाश लीला के भावपूर्ण मंचन के साथ हुआ।
प्रथम दिवस कलाकारों ने अपने सजीव अभिनय से दर्शकों को रामायण के पौराणिक प्रसंगों से रूबरू कराया। वहीं, श्रवण कुमार के माता-पिता की करुण पुकार और राजा दशरथ को दिए गए श्राप के प्रसंग ने दर्शकों को भावुक कर दिया।
रामलीला का शुभारंभ ढोल-दमाऊं की थाप के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना, हवन और आरती के साथ किया गया। इसके बाद मंच पर पौराणिक कथाओं का सिलसिला शुरू हुआ। रामलीला देखने के लिए पहुंचे दर्शक कलाकारों के अभिनय और संवादों में पूरी तरह डूबे नजर आए।
श्रवण कुमार की लीला ने भावुक किए दर्शक
प्रथम दृश्य में मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की लीला का मंचन किया गया। कथा के अनुसार, राजा दशरथ के शब्दभेदी बाण से श्रवण कुमार घायल हो जाते हैं। अपने पुत्र की मृत्यु से व्यथित उनके अंधे माता-पिता राजा दशरथ को पुत्र वियोग का श्राप देते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार उन्हें अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्यागने पड़ रहे हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ को भी एक दिन पुत्र वियोग की पीड़ा सहनी पड़ेगी।
कलाकारों ने इस मार्मिक प्रसंग को भावपूर्ण अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया। माता-पिता की पीड़ा और श्रवण कुमार की मातृ-पितृ भक्ति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
रावण, कुंभकरण और विभीषण की तपस्या का मंचन
इसके बाद रावण, कुंभकरण और विभीषण की ब्रह्माजी की तपस्या का दृश्य प्रस्तुत किया गया। तीनों भाइयों की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उन्हें वरदान देते हैं। रावण को अपार शक्ति, कुंभकरण को छह माह तक निद्रा में रहने तथा विभीषण को भगवान श्रीराम की भक्ति का वरदान प्राप्त होता है।
इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने पौराणिक कथा को मंच पर जीवंत किया और दर्शकों को रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं से परिचित कराया।
कैलाश पर्वत उठाने चला रावण, भगवान शिव ने तोड़ा अहंकार
कैलाश लीला के मंचन में नारद मुनि रावण के दरबार में पहुंचते हैं और स्वर्ण नगरी लंका की शोभा बढ़ाने के लिए कैलाश पर्वत को वहां लाने का सुझाव देते हैं। इसके बाद रावण अपने बल के अहंकार में कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास करता है, लेकिन भगवान शिव उसके अहंकार को चूर-चूर कर देते हैं।
इस दृश्य ने दर्शकों को यह संदेश दिया कि शक्ति और सामर्थ्य के बावजूद अहंकार का अंत निश्चित है। कलाकारों के अभिनय और संवादों ने इस प्रसंग को प्रभावशाली बना दिया।
ऋषि-मुनियों के श्राप से जुड़ी कथा ने बढ़ाई उत्सुकता
रामलीला के अगले प्रसंग में रावण अपने सैनिकों को ऋषि-मुनियों से कर वसूलने के लिए भेजता है। ऋषि-मुनि कर के रूप में अपने रक्त से भरे पात्र देते हुए रावण के विनाश का श्राप देते हैं। इसके बाद रावण अपने सैनिकों को रक्त से भरे घड़े को मिथिला पुरी की धरती में गाड़ने का आदेश देता है।
इस प्रसंग ने कथा को नया मोड़ दिया और आगे होने वाली घटनाओं के प्रति दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाई।
इन कलाकारों ने निभाईं प्रमुख भूमिकाएं
रामलीला के प्रथम दिवस श्रवण कुमार की भूमिका मनोज भट्ट, राजा दशरथ की भूमिका राम प्रकाश भट्ट, ब्रह्माजी की भूमिका प्रवीण पंवार, रावण की भूमिका सचिन लेखवार, कुंभकरण की भूमिका दीपेंद्र रावत, विभीषण की भूमिका दीपक सजवाण, सुमंत की भूमिका दीपक सकलानी, नारद मुनि की भूमिका मुनिम प्रधान तथा मंत्री की भूमिका विनोद राणा ने निभाई।
जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रीय गणमान्य लोगों की रही मौजूदगी
कार्यक्रम में ग्राम पंचायत थत्यूड़ की प्रधान मेनका सजवाण, ग्राम पंचायत ब्रह्मसारी की प्रधान सरस्वती देवी, ग्राम पंचायत खनेरी की प्रधान सरिता देवी, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राम प्रकाश चमोली, भाजपा थत्यूड़ मंडल की महामंत्री विनिता रावत, पूर्व ज्येष्ठ प्रमुख महिपाल रावत, पूर्व प्रधान संजय सेमवाल, सेवानिवृत्त कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष खेमराज भट्ट, जयवीर गुसाईं, हरि लेखवार, सहायक खंड विकास अधिकारी डीपी चमोली, क्षेत्रीय युवा कल्याण अधिकारी चतर लाल, रामलीला समिति के अध्यक्ष गजेंद्र असवाल और सचिव सुनील सजवाण उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त हरि लाल, संदीप पंवार, हरीश नौटियाल, ब्रह्मदेवी असवाल, राधिका सकलानी, चंद्रकला सजवाण, सुनीता सजवाण, संगीता चमोली सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।
मंच संचालन प्रसिद्ध मंच संचालक सुनील सजवाण ने किया।
नई पीढ़ी को संस्कृति और संस्कारों से जोड़ने की पहल
थत्यूड़ की पौराणिक रामलीला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मूल्यों को जीवंत रखने का माध्यम भी है। रामायण के प्रसंगों के जरिए नई पीढ़ी को मर्यादा, भक्ति, सत्य और धर्म के आदर्शों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। रामलीला के शुभारंभ के साथ ही क्षेत्र में धार्मिक और सांस्कृतिक उत्साह का माहौल देखने को मिला।



