उत्तराखंड

यूट्यूब से सीखा हुनर, हाथों से संवारा रोजगार; 20 साल की अंजली बनीं पहाड़ की बेटियों के लिए मिसाल

बिना सरकारी मदद और किसी संस्था से जुड़े अपने दम पर शुरू किया हस्तशिल्प का काम, राखी से लेकर हैंडबैग, गुलदस्ता और झूमर तक बना रहीं अंजली

रिपोर्ट –मुकेश रावत 
थत्यूड़/सकलाना। अगर हुनर को सही मंच मिल जाए तो पहाड़ की बेटियां रोजगार मांगने वाली नहीं, रोजगार देने वाली बन सकती हैं। सकलाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत हटवाल गांव की महज 20 वर्षीय कु. अंजली हटवाल की कहानी इसी उम्मीद की मिसाल है।

राजकीय इंटर कॉलेज मरोड़ा से 12वीं तक पढ़ाई करने वाली अंजली ने करीब एक साल पहले YouTube के माध्यम से हस्तशिल्प बनाना सीखना शुरू किया। कोई प्रशिक्षक नहीं, कोई बड़ा संस्थान नहीं और किसी सरकारी योजना का सहारा भी नहीं—मोबाइल पर वीडियो देखकर सीखा और अपने हाथों के हुनर को रोजगार में बदल दिया।

आज अंजली अपने हाथों से राखी, हैंडबैग, स्वेटर की चेन, गुलदस्ते, झूमर सहित कई आकर्षक हस्तशिल्प सामग्री तैयार कर रही हैं। उनकी बनाई राखी करीब 20 रुपये, हैंडबैग 200 रुपये और गुलदस्ता करीब 300 रुपये तक में बिक रहा है।

सबसे बड़ी बात यह है कि अंजली के उत्पादों की मांग अब गांवों तक पहुंचने लगी है। आसपास के लोग उन्हें सामान बनाने के ऑर्डर दे रहे हैं। शुरुआत में महज सीखने के लिए शुरू किया गया यह काम अब धीरे-धीरे स्वरोजगार और आमदनी का जरिया बनता जा रहा है।

एक घंटे की मेहनत, आत्मनिर्भरता की बड़ी उम्मीद

अंजली रोजाना करीब एक घंटा अपने इस हुनर को देती हैं। फिलहाल वह अकेले ही पूरा काम संभाल रही हैं। उनका सपना है कि काम आगे बढ़े तो गांव की अन्य महिलाओं और युवतियों को भी इससे जोड़ा जाए, ताकि एक अंजली का हुनर कई पहाड़ी परिवारों की आय का जरिया बन सके।

अंजली का कहना है कि उन्होंने हस्तशिल्प बनाना YouTube से सीखा। लोगों को उनके बनाए उत्पाद पसंद आ रहे हैं और मांग मिलने से उनका उत्साह बढ़ा है। वह इस काम को आगे बढ़ाना चाहती हैं।

सरकार तक पहुंचनी चाहिए अंजली की आवाज

अंजली की कहानी सिर्फ एक लड़की के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ के उन हजारों युवाओं की तस्वीर है, जिनके भीतर हुनर तो है, लेकिन सही मंच और बाजार तक पहुंच नहीं।

सामाजिक कार्यकर्ता अनिल हटवाल ने कहा कि पहाड़ के गांवों में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो केवल प्रोत्साहन, प्रशिक्षण, बाजार और सही मंच की। अंजली ने बिना किसी बाहरी सहायता के जिस तरह अपने हुनर को स्वरोजगार में बदला है, वह दूसरी बेटियों के लिए प्रेरणा है।

उन्होंने कहा कि यदि ऐसी प्रतिभाओं को सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, बाजार उपलब्ध कराने और स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ा जाए तो गांवों से पलायन रोकने की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।

अब जरूरत है एक मौके की

अंजली ने अपना हुनर साबित कर दिया है। अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार विभाग और सरकार ऐसी बेटियों तक पहुंचकर उनके हुनर को आगे बढ़ाने के लिए मंच देंगे?

अगर अंजली जैसी बेटियों को सरकारी प्रशिक्षण, बाजार, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने का अवसर, ऑनलाइन बिक्री और उचित मार्गदर्शन मिले तो उनका छोटा सा घरेलू प्रयास एक बड़े ग्रामीण उद्यम का रूप ले सकता है।

पहाड़ की इस बेटी को दया नहीं, अवसर चाहिए। मदद नहीं, अपने हुनर को बाजार तक पहुंचाने का मंच चाहिए।

अंजली की कहानी शायद उन तमाम बेटियों को भी संदेश दे रही है जो घर में रहकर कुछ नया करना चाहती हैं—हुनर छोटा नहीं होता, बस उसे पहचानने और आगे बढ़ाने की जरूरत होती है।

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